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लॉन्ग टर्म व शॉर्ट टर्म कैपिटल एसेट

लॉन्ग टर्म व शॉर्ट टर्म कैपिटल एसेट आयकर अधिनियम की धारा 2(42A) व (42B) में शार्ट टर्म कैपिटल एसेट व लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट की परिभाषा दी है। 1. शेयर्स, म्यूच्यूअल फण्ड आदि 12 महीने पुराने लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट बाकी शार्ट टर्म। 2. अचल

कैपिटल एसेट क्या है

कैपिटल एसेट क्या है आयकर अधिनियम की धारा 2(14) में यह बताया है कि कौन- कौन सी सम्पतियाँ कैपीटल एसेट हैं अर्थात उनको बेचने पर इनकम टैक्स लगेगा। 1. सभी संपतियां कैपिटल एसेट हैं जैसे, प्लाट, भूमि एवं भवन, शहरी एग्रीकल्चर लैंड, 2. शहरों के

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन में से छूट व कर की गणना

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन में से छूट व कर की गणना: लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन में से छूट व कर की गणना!  लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन में से निम्नलिखित छूट मिलेंगी, उसके बाद धारा 112 व 112ए के अनुसार कर की गणना होगी।    धारा

शॉर्ट टर्म कैपिटल एसेट बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन की गणना एवं टैक्स

शॉर्ट टर्म कैपिटल एसेट बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन की गणना एवं टैक्स:   बेचने पर प्राप्त होने वाली राशि में से बेचने पर होने वाले खर्चे ( ब्रोकरेज आदि) घटाने के बाद उस एसेट की लागत और उस पर और कोई खर्चा हुआ

कैपिटल एसेट क्या है?

कैपिटल एसेट क्या है? आयकर अधिनियम की  धारा 2(14) में यह बताया है कि कौन- कौन सी सम्पतियाँ कैपीटल एसेट हैं अर्थात उनको बेचने पर इनकम टैक्स लगेगा।        1.   सभी संपतियां कैपिटल एसेट हैं जैसे, प्लाट, भूमि एवं भवन, शहरी एग्रीकल्चर लैंड,

इनकम टैक्स में केपिटल गेन टैक्स

इनकम टैक्स में केपिटल गेन टैक्स: आजकल हर व्यक्ति का कभी न कभी कैपिटल गेन टैक्स से पाला पड़ रहा है। क्योंकि पुराने जमाने में व्यक्ति अपनी बचत का इन्वेस्टमेंट बैंक एफडी, पोस्ट ऑफिस, पीपीएफ,एलआईसी, घर में नकदी, मित्रों को हाथ उधारी में करता था।

सैलरीड पर्सन्स की पुरानी सालों में इनकम टैक्स की डिमांड

सैलरीड पर्सन्स की पुरानी सालों में इनकम टैक्स की डिमांड: हमारे सामने पिछले साल में ऐसे कई मामले आए हैं:-                पहले के समय कर्मचारी का टीडीएस कट जाता था। डीडीओ या employer उसको फॉर्म 16 दे देता था।

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की गणना

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की गणना सबसे पहले प्रॉपर्टी की बिक्री से प्रतिफल की राशि लेंगे। अगर प्रतिफल की राशि व डीएलसी में अंतर है तथा अंतर प्रतिफल के 5% से ज्यादा है तो प्रतिफल की बजाय डीएलसी की वैल्यू लेनी होगी। अगर एग्रीमेंट की